Friday, 10 April 2026

देर

 कहा जाता है कि दुर्घटना से देर भली। पर क्या ये सच नहीं कि कभी कभी देर भी दुर्घटना का ही एक अन्य रूप होता है। कई बार देरी इतनी लंबी होती है कि इंसान ही खर्च हो जाता है पर जिस व्यक्ति, वक्त या वस्तु का इंतजार वो कर रहा होता है वह उसके जीवन पर्यन्त भी चलता रहता है।

राधिका , एक अच्छी पत्नी, एक प्यारी मां, एक संस्कारी बहू ये सब राधिका के ही मानो पर्याय थे। 

यूं तो राधिका के पास अब था। इज्ज़तदार परिवार, प्यारे प्यारे दो बच्चे ओर धन संपत्ति। वो 5 रूपये की चीज़ मांगती तो उसके पति उसे 500 देते। पर फिर भी उसका मन अकेला ओर दुखी रहता। उसके पति के पास उसके लिए समय नहीं था। कभी काम के बहाने तो कभी कुछ और के बहाने वो अक्सर घर से बाहर ही रहते थे। ऐसा नहीं था कि वो राधिका से प्रेम नहीं करते थे, पर ये कहां लिखा था कि उसके अलावा किसी और से वे प्रेम कर ही नहीं सकते थे। बस यही एक दुख नहीं था राधिका को। उसके पति को मदिरा पान की भी लत थी। रोज शाम से ही उनके घर की छत पर नॉनवेज और मदिरा पान की महफिल सजती।  राधिका का बचपन एक सात्विक परिवार में बीता था। उसे इस सब की आदत नही थी। अतः उसने विरोध किया। और तब शुरू हुआ कभी न खत्म होने वाला वनवास। अब राधिका के पति ने घर के बाहर ठिकाना ढूंढ लिया। रात रात तक घर से बाहर अपने संगी साथियों के साथ मदमस्त रहते, और घर में राधिका धीरे धीरे टूट रही थी। ओर एक दिन जब उसकी सहनशक्ति ने जवाब दे दिया तो घायल आत्मा ने छोड़ दिया उसके शरीर का साथ।

रोना धोना हुआ और कुछ समय बाद राधिका के पति भी दूसरा विवाह कर अपना जीवन खुशी खुशी बिताने लगे। अब उनको एहसास हुआ और उन्होंने अपनी सभी गलत आदतें छोड़ दीं। देर आए पर दुरुस्त कहां आए। राधिका की घायल आत्मा आज भी चीख चीख कर पूछती है कि जो प्रेम जो सम्मान और समय तुम अपनी नई पत्नी को दे रहे हो, मैं भी तो उसकी अधिकारिणी थी। मुझे वो क्यों नहीं मिला? आप अपनी जिंदगी में इतने रम गए कि मुझे भूल ही गए। मेरा श्राद्ध भी तुम नहीं कर पाए। अब संस्कारी बन कर मंदिर के पुजारी बन बैठे हो क्या तुम्हारा ये पाखंड ईश्वर स्वीकार करेंगे? किसे मूर्ख बना रहे हो? आज भी राधिका की आत्मा इंसाफ मांग रही है। क्या उसे इंसाफ मिलेगा?

Thursday, 9 April 2026

अपनापन

 निर्मला । शांत सी भोली सी महिला। बहुत धीरे धीरे प्यार से बोलती थी मानो कानों में मिश्री घोल रही हो। सबकी सहायता के लिए हमेशा तैयार रहती। पर उसकी आंखें सदा क्षितिज पर टिकी रहतीं। मानो कुछ खो गया हो उसका, जिसे ढूंढ रही हो। उसकी आंखों में हमेशा एक बेचैनी सी रहती थी।

बचपन में निर्मला भी अन्य सामान्य बच्चों की ही तरह थी। शरारती, अल्हड़ और मासूम। पर ज्यों ज्यों बड़ी हुई, उसे विधाता का खेल समझ आने लगा। ये उसके असली माता पिता नहीं थे। उसे कहीं से गोद लिया गया था। उसके पिता तो उसके साथ स्नेह वत व्यवहार करते थे, परन्तु एक छोटी बहन के आने के बाद उसकी माता का व्यवहार कुछ बदल सा गया था। अब वो उससे ज्यादा बात नहीं करती थी। उसके साथ ऐसा व्यवहार करती थी जैसे वो घर में है ही नहीं। यहां तक तो फिर भी ठीक था।पर उसकी दादी उसे कोसने का एक भी मौका नहीं छोड़ती थीं। उनकी बातों से ही उसने जाना कि वो अलग है।  वो तो  इन लोगों को अपना ही मानती थी पर शायद वो उनकी अपनी नहीं थी। यूं तो निर्मला का सबसे दिल से जुड़ाव था । वह जो भी करती सबके लिए मन से करती फिर भी अक्सर सोचा करती , कैसा होता होगा वो अपना वाला अपनापन जो उसके पास नहीं है। यूं ही समय बीतता गया। निर्मला के पिता ने एक अच्छे घर में उसकी शादी कर दी। आज उसके दो बच्चे हैं। एक बेटा और एक बेटी। पर वो आज भी इसी उलझन में रहती है कि क्या मैं इनको अपना वाला अपनापन दे पा रही हूं? सबकी जरूरतों का निर्मला बहुत बारीकी से ध्यान रखती है। लेकिन मन में वही सवाल! जो मैंने नहीं पाया वो मैं दे पा रही हूँ क्या? मुझे कैसे पता चलेगा कि सबका ध्यान रखना ओर अपनेपन में क्या फर्क है? मैं कैसे समझूं, कहां से पाऊं वो अपना वाला अपनापन! कहीं कोई हो मु बताए।

प्लीज रिप्लाई 

Tuesday, 7 April 2026

संस्कार

कभी कभी जिन्दगी हमें एक ऐसी पहेली में उलझा देती है, जिसका जवाब शायद हम जानते तो हैं पर देना नहीं चाहते। कई बार जवाब देना भी अपनी हार ही बताता है और चुप रहते हैं तो भी कौन सा जीत ही जाते हैं। 
मोनू 12 साल का था जब उसकी मां उसे छोड़ कर गईं। उससे छोटे दो भाई बहन और थे। निशा 11 साल की और जय 8 साल का। उनके पिता कस्बे के माने हुए दबंगों एक थे। मोनू के पिता कुछ दिलफेंक किस्म के व्यक्ति थे। जब मोनू की मां जीवित थी तो वे रात रात तक घर न आकर यूं ही यार दोस्तों बैठे रहा करते थे। मां जब मोनू को उन्हें बुलाने भेजती तो वे उसे भी वहीं बिठा लेते। और फिर सजती महफिल जिसका साक्षी नन्हा मोनू भी होता। 
मोनू की मां:::;;; वैसे उनका नाम अवधेश था। पर,,,,उनकी अपनी पहचान या उनका अपना अस्तित्व था ही कहां? वो तो सबके लिए सिर्फ मोनू की मां ओर उसके भाई बहनों की मां ही थीं। इसके आगे न तो किसी ने उनके बारे में कभी सोचा ओर न ही उन्हें सोचने दिया। जिंदगी ठहर सी गई थी। और फिर एक दिन '''' मुक्ति मिल गई उन्हें रोज रोज़ के इंतजार से, मुक्ति मिल गई उन्हें यंत्रवत केवल वही सोचने ओर करने से जो उनके पति द्वारा तय किया जाता था।
वैसे उस दिन मुक्ति सिर्फ अवधेश की नहीं उनके पति की भी हुई थी। 12 साल पुराने विवाह से मुक्ति, पत्नी द्वारा दी जाने वाली समझाइशों से मुक्ति। वैसे भी ये विवाह तो काफी लंबा खिंचा था। इसके पहले वाली ने तो 2 वर्ष में ही रास्ता साफ कर दिया था। चलो देर से ही सही मुक्ति तो मिली।
मां के जाने के बाद बच्चों की जिंदगी बदरंग होकर ठहर सी गई पर पिता जी की जिन्दगी में नए रंग भर गए। अब अपने इस खेल में उन्होंने अपने बच्चों को भी शामिल कर लिया। रोज चौराहे पर मोनू के साथ खड़े होकर वहां से गुजरने वाली महिलाओं को मोनू के हाथ से आमंत्रण भिजवाते। बच्चा समझ कर कोई कुछ न कह पाता। फिर एक दिन एक महिला ने उनको रिस्पॉन्स दिया। और बात बन गई। महिला भी विधवा थी अतः कोई विशेष परेशानी आई नहीं, पर दोनों की उम्र में पिता और पुत्री का अंतर था।  बच्चों की दूसरी मां यूं तो मां बन कर ही आई थी पर उनके हृदय में मां की भावनाएं नहीं थीं। खैर समय बीता ओर गाड़ी आगे चल पड़ी। मोनू के पिता अब उम्र की ढलान पर थे और मोनू अब वयस्क हो रहा था।जीवन , उत्साह से भरा हुआ पर संस्कारों के नाम पर खाली । उसका विवाह एक ऐसे घराने में तय हुआ जहां के लोग पढ़े लिखे और संस्कारवान थे। उसकी पत्नी शीतल बेहद संस्कारी ओर सुशील थी। आरम्भ में उससे सारी बुराइयां छुपाई गईं। पर सच्चाई कहां ज्यादा दिन छुपती है। धीरे धीरे जब उसे ये पता लगा कि यहाँ पर सब कुछ बिल्कुल उससे उल्टा है जैसा उसे बताया गया था, तो उसका दम घुटने लगा। उसने हार नहीं मानी। मोनू को सही रस्ते पर लाने के लिए उसने दिन रात एक कर दिया। पर बचपन के संस्कार क्या इतने जल्दी छूटते हैं?  अब उसने मोनू के पिता से सहायता मांगी पर उन्होंने तो उसे ही दोषी ठहरा दिया। वे बोले कि जरूर शीतल में ही कुछ कमी है जिसके कारण मोनू का मन बाहर ठिकाना ढूंढता है। 
दोस्तों आज मोनू चाहकर भी अपनी बुरी आदतें छोड़ नहीं पा रहा है।उसकी पत्नी उसके बच्चे कोई भी उसके साथ खुश नहीं हैं। वो न तो अपने पिता को छोड़ पा रहा है न ही अपनी पत्नी और बच्चों को। मेरा सवाल ये है कि गलती उनके पिता की है तो सजा मोनू के परिवार को क्यों? 
क्या शीतल को मोनू के पिता को माफ करना चाहिए?
क्या मोनू को अपने पिता की गलती समझ आएगी? 
मोनू अपने बच्चों को कैसे संस्कार देगा?
क्या मोनू के बच्चे कभी उसका सम्मान कर पाएंगे?


Tuesday, 31 October 2023

तुम और मैं

 ये कहानी तब से आरंभ होती है जब से मैंने होश सम्हाला। मुझे हर पल लगता कि वो साथ ही हैं। वो? वो कौन? क्या मैं उनको जानती हूं? शायद हां। शायद नहीं। पर वो जो भी हो, कम से कम मुझे अकेलेपन का एहसास नहीं होने देता है। मुझे उससे डर भी नहीं लगता।आपको बताती हूं कि मेरा उससे पहला परिचय कब हुआ। 

दिवाली का समय। मेरे पिताजी (मैं अपने दादाजी को पिताजी कह के बुलाती थी।) मेरे लिए एक खिलौना गन लाए जिससे छोटे पटाखे चलाए जाते हैं! साकेत में घर की दहलीज पर मैं अपनी गन से खेल रही थी । अकेली ही। अचानक न जाने क्या सूझा। गन में पटाखा लगाकर अपनी बाईं आंख की ओर ले जाकर चला दिया। एक हाथ कही से आया जिसने मेरा पूरा मुंह ढक लिया और मेरे हाथ से गन छीन कर फेंक दी। मैं हतप्रभ थी। कुछ समझ नहीं आया। परंतु ये सब पास रहने वाली एक आंटी देख रही थीं। उन्होंने मेरी अम्मा को बुलाया। और कहा कि इसे आंख में इतनी जोर से लगी है कि इसकी गन भी इसके हाथ से छूट कर दूर जा गिरी।

दूर जा गिरी? तो क्या उन्होंने वो सब नहीं देखा जो मेरे साथ हुआ? ये था मेरा उससे पहला परिचय। 

क्रमशः 

देर

 कहा जाता है कि दुर्घटना से देर भली। पर क्या ये सच नहीं कि कभी कभी देर भी दुर्घटना का ही एक अन्य रूप होता है। कई बार देरी इतनी लंबी होती है ...