निर्मला । शांत सी भोली सी महिला। बहुत धीरे धीरे प्यार से बोलती थी मानो कानों में मिश्री घोल रही हो। सबकी सहायता के लिए हमेशा तैयार रहती। पर उसकी आंखें सदा क्षितिज पर टिकी रहतीं। मानो कुछ खो गया हो उसका, जिसे ढूंढ रही हो। उसकी आंखों में हमेशा एक बेचैनी सी रहती थी।
बचपन में निर्मला भी अन्य सामान्य बच्चों की ही तरह थी। शरारती, अल्हड़ और मासूम। पर ज्यों ज्यों बड़ी हुई, उसे विधाता का खेल समझ आने लगा। ये उसके असली माता पिता नहीं थे। उसे कहीं से गोद लिया गया था। उसके पिता तो उसके साथ स्नेह वत व्यवहार करते थे, परन्तु एक छोटी बहन के आने के बाद उसकी माता का व्यवहार कुछ बदल सा गया था। अब वो उससे ज्यादा बात नहीं करती थी। उसके साथ ऐसा व्यवहार करती थी जैसे वो घर में है ही नहीं। यहां तक तो फिर भी ठीक था।पर उसकी दादी उसे कोसने का एक भी मौका नहीं छोड़ती थीं। उनकी बातों से ही उसने जाना कि वो अलग है। वो तो इन लोगों को अपना ही मानती थी पर शायद वो उनकी अपनी नहीं थी। यूं तो निर्मला का सबसे दिल से जुड़ाव था । वह जो भी करती सबके लिए मन से करती फिर भी अक्सर सोचा करती , कैसा होता होगा वो अपना वाला अपनापन जो उसके पास नहीं है। यूं ही समय बीतता गया। निर्मला के पिता ने एक अच्छे घर में उसकी शादी कर दी। आज उसके दो बच्चे हैं। एक बेटा और एक बेटी। पर वो आज भी इसी उलझन में रहती है कि क्या मैं इनको अपना वाला अपनापन दे पा रही हूं? सबकी जरूरतों का निर्मला बहुत बारीकी से ध्यान रखती है। लेकिन मन में वही सवाल! जो मैंने नहीं पाया वो मैं दे पा रही हूँ क्या? मुझे कैसे पता चलेगा कि सबका ध्यान रखना ओर अपनेपन में क्या फर्क है? मैं कैसे समझूं, कहां से पाऊं वो अपना वाला अपनापन! कहीं कोई हो मु बताए।
प्लीज रिप्लाई
Very nice
ReplyDeleteBahut hi satik dil ki gahraiyon me utrti mahsus hoti kahani...
ReplyDeleteBahut badhiya.
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