मोनू 12 साल का था जब उसकी मां उसे छोड़ कर गईं। उससे छोटे दो भाई बहन और थे। निशा 11 साल की और जय 8 साल का। उनके पिता कस्बे के माने हुए दबंगों एक थे। मोनू के पिता कुछ दिलफेंक किस्म के व्यक्ति थे। जब मोनू की मां जीवित थी तो वे रात रात तक घर न आकर यूं ही यार दोस्तों बैठे रहा करते थे। मां जब मोनू को उन्हें बुलाने भेजती तो वे उसे भी वहीं बिठा लेते। और फिर सजती महफिल जिसका साक्षी नन्हा मोनू भी होता।
मोनू की मां:::;;; वैसे उनका नाम अवधेश था। पर,,,,उनकी अपनी पहचान या उनका अपना अस्तित्व था ही कहां? वो तो सबके लिए सिर्फ मोनू की मां ओर उसके भाई बहनों की मां ही थीं। इसके आगे न तो किसी ने उनके बारे में कभी सोचा ओर न ही उन्हें सोचने दिया। जिंदगी ठहर सी गई थी। और फिर एक दिन '''' मुक्ति मिल गई उन्हें रोज रोज़ के इंतजार से, मुक्ति मिल गई उन्हें यंत्रवत केवल वही सोचने ओर करने से जो उनके पति द्वारा तय किया जाता था।
वैसे उस दिन मुक्ति सिर्फ अवधेश की नहीं उनके पति की भी हुई थी। 12 साल पुराने विवाह से मुक्ति, पत्नी द्वारा दी जाने वाली समझाइशों से मुक्ति। वैसे भी ये विवाह तो काफी लंबा खिंचा था। इसके पहले वाली ने तो 2 वर्ष में ही रास्ता साफ कर दिया था। चलो देर से ही सही मुक्ति तो मिली।
मां के जाने के बाद बच्चों की जिंदगी बदरंग होकर ठहर सी गई पर पिता जी की जिन्दगी में नए रंग भर गए। अब अपने इस खेल में उन्होंने अपने बच्चों को भी शामिल कर लिया। रोज चौराहे पर मोनू के साथ खड़े होकर वहां से गुजरने वाली महिलाओं को मोनू के हाथ से आमंत्रण भिजवाते। बच्चा समझ कर कोई कुछ न कह पाता। फिर एक दिन एक महिला ने उनको रिस्पॉन्स दिया। और बात बन गई। महिला भी विधवा थी अतः कोई विशेष परेशानी आई नहीं, पर दोनों की उम्र में पिता और पुत्री का अंतर था। बच्चों की दूसरी मां यूं तो मां बन कर ही आई थी पर उनके हृदय में मां की भावनाएं नहीं थीं। खैर समय बीता ओर गाड़ी आगे चल पड़ी। मोनू के पिता अब उम्र की ढलान पर थे और मोनू अब वयस्क हो रहा था।जीवन , उत्साह से भरा हुआ पर संस्कारों के नाम पर खाली । उसका विवाह एक ऐसे घराने में तय हुआ जहां के लोग पढ़े लिखे और संस्कारवान थे। उसकी पत्नी शीतल बेहद संस्कारी ओर सुशील थी। आरम्भ में उससे सारी बुराइयां छुपाई गईं। पर सच्चाई कहां ज्यादा दिन छुपती है। धीरे धीरे जब उसे ये पता लगा कि यहाँ पर सब कुछ बिल्कुल उससे उल्टा है जैसा उसे बताया गया था, तो उसका दम घुटने लगा। उसने हार नहीं मानी। मोनू को सही रस्ते पर लाने के लिए उसने दिन रात एक कर दिया। पर बचपन के संस्कार क्या इतने जल्दी छूटते हैं? अब उसने मोनू के पिता से सहायता मांगी पर उन्होंने तो उसे ही दोषी ठहरा दिया। वे बोले कि जरूर शीतल में ही कुछ कमी है जिसके कारण मोनू का मन बाहर ठिकाना ढूंढता है।
दोस्तों आज मोनू चाहकर भी अपनी बुरी आदतें छोड़ नहीं पा रहा है।उसकी पत्नी उसके बच्चे कोई भी उसके साथ खुश नहीं हैं। वो न तो अपने पिता को छोड़ पा रहा है न ही अपनी पत्नी और बच्चों को। मेरा सवाल ये है कि गलती उनके पिता की है तो सजा मोनू के परिवार को क्यों?
क्या शीतल को मोनू के पिता को माफ करना चाहिए?
क्या मोनू को अपने पिता की गलती समझ आएगी?
मोनू अपने बच्चों को कैसे संस्कार देगा?
क्या मोनू के बच्चे कभी उसका सम्मान कर पाएंगे?
Very nice story
ReplyDelete