ये कहानी तब से आरंभ होती है जब से मैंने होश सम्हाला। मुझे हर पल लगता कि वो साथ ही हैं। वो? वो कौन? क्या मैं उनको जानती हूं? शायद हां। शायद नहीं। पर वो जो भी हो, कम से कम मुझे अकेलेपन का एहसास नहीं होने देता है। मुझे उससे डर भी नहीं लगता।आपको बताती हूं कि मेरा उससे पहला परिचय कब हुआ।
दिवाली का समय। मेरे पिताजी (मैं अपने दादाजी को पिताजी कह के बुलाती थी।) मेरे लिए एक खिलौना गन लाए जिससे छोटे पटाखे चलाए जाते हैं! साकेत में घर की दहलीज पर मैं अपनी गन से खेल रही थी । अकेली ही। अचानक न जाने क्या सूझा। गन में पटाखा लगाकर अपनी बाईं आंख की ओर ले जाकर चला दिया। एक हाथ कही से आया जिसने मेरा पूरा मुंह ढक लिया और मेरे हाथ से गन छीन कर फेंक दी। मैं हतप्रभ थी। कुछ समझ नहीं आया। परंतु ये सब पास रहने वाली एक आंटी देख रही थीं। उन्होंने मेरी अम्मा को बुलाया। और कहा कि इसे आंख में इतनी जोर से लगी है कि इसकी गन भी इसके हाथ से छूट कर दूर जा गिरी।
दूर जा गिरी? तो क्या उन्होंने वो सब नहीं देखा जो मेरे साथ हुआ? ये था मेरा उससे पहला परिचय।
क्रमशः
Very nice
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